बुधवार, 11 सितंबर 2013

दंगों के विरोध में

नफरत की विषबेल ये ,यहाँ किसने आकर बोई |
लहू बहा है किसका ,देख बता सकता क्या कोई ?|
छोटी-छोटी बातों को ,फिर तूल दे रहे लोग    |
यह सोची-समझी साजिश है,नहीं महज संयोग ||
सिर पर देख चुनाव ,सियासी लोग चल गए चाल |
जाति,धर्म की चिंगारी ,दी जानबूझ कर डाल  ||
कितने मासूमों ने अपने अभिभावक खोये हैं ?
कितने बूढ़े बापों ने  , बेटों के शव ढोए हैं   ??
जोह रहे हैं कितने ही परिजन अपनों की राह ?
लगा दरकने उनके भी अब चेहरे का उत्साह ||
बेकसूर लोगों की ,  जब भी हत्या होती है   |
धरती माता पीट-पीट कर छाती रोती है  | |
हिन्दू हों या मुसलमान ,हैं भारत माँ के लाल |
मचा हुआ है जाति धर्म पर फिर क्यों यहाँ बवाल ||
इन टूटे लोगों को फिर से खड़ा करेगा कौन ?
किंकर्तव्यविमूढ़ राज्य है इस सवाल पर मौन ||

सोमवार, 25 जुलाई 2011

अपनेपन का पड़ा आज दुष्काल
डँस लेते अपने ही बनकर व्याल/
करते एक दूसरे सब द्वेष
प्रेम और विश्वास हुआ निःशेष /
दुरभिसंधियों का फैला है जाल
बढ़ा घात-प्रतिघात यहाँ विकराल/
फिर भी चिंता नहीं किसी को लेश
कहाँ जा रहा है अपना यह देश /
है यही आज का यह संदेष विशेष
यों मत पीछे की ओर धकेलो देश//

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

तुम साकार आस्था हो,अभिनंदनीय हो
धरती के बेटे किसान तुम वंदनीय हो/
बीज नहीं तुम खेतों में जीवन बोए हो
भैरव श्रम से कभी नहीं विचलित होते हो/
वज्र कठोर,पुष्प से कोमल हो स्वभाव से
हंसकर विष भी पी जाते हो सहज भाव से/
तुमने इस जग पर कितना उपकार किया है
बीहड़ बंजर धरती का श्रृंगार किया है/
हरियाली के स्वर में जब धरती गाती है
देख तुम्हारा सृजन प्रकृति भी इठलाती है/
अपर अन्नदाता का जिसको मिला मान है
निर्विवाद वह धरती का बेटा किसान है//

बुधवार, 9 मार्च 2011

होली

जब आँतें कुलबुला रही हों ,
कंठ प्यासा हो ,
मन विकल और उदास हो ।
और चिथड़ों में लिपटी ज़िंदगियों की
एक पूरी जमात आसपास हो ।
तब होली पर यही कामना है
कि कुछ रोटियाँ ,थोड़ा-सा पीने लायक पानी और ठीक से पहने जाने लायक कपड़े जुट सकें ताकि इन बदरंग ज़िंदगियों में रंग लौट आए और 'होली' 'होती हुई' लगे ॥

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

संकल्प

स्वाधीन बनें,लोकोन्मुख हों,
हर पल अनुशासनबद्ध रहें /
कर्तव्यों और दायित्वों के
पालन के प्रति सनद्ध रहें /
मानवता पोषक मूल्यों का
संकल्पपूर्वक वरण करें /
वैज्ञानिक सोच-समझ रक्खें ,
आदर्शोन्मुख आचरण करें /
हो यही चेष्टा जीवन में
आगे-आगे बढ़ाते जाएँ /
अभुदय और निःश्रेयश के
सोपानों पर चढ़ते जाएँ //

      

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

सुना अप्सराओं का जैसा मनहर अनुपम रूप

सुना अप्सराओं का जैसा मनहर अनुपम रूप /
सुमुखि   तुम भी वैसी ही दिखती हो नवल अनूप/
मोहनी जिस पर सभी मुग्ध हैं,चकित चराचर सृष्टी
इंद्रजाल लगती है सचमुच जिसकी वंकिम दृष्टी /
सौम्य लगा करती जैसे,जाड़ों में कच्ची धूप /
वैसे ही लगता है सुखकर,सुमुखि तुम्हारा रूप/
रूपराशि से बढ़कर धन्ये,सौम्य तुम्हारा शील /
जहाँ भद्रता आश्रय पाती, वर्जित है अश्लील  /
ओ साकार ज्योत्स्ना, जीवन के निर्मल मृदु हास/
ओ प्रतिक्षण जीवंत हो रहे प्रातः के विश्वास  /
विमल ऋचा वेदों की,ओ आगम की गिरा पुनीत /
आकर जीवन में ढालो यह शुचिता का संगीत  //

रविवार, 26 सितंबर 2010

जब बदला नहीं समाज ....

जब बदला नहीं समाज,राम की चरित कथाओं से /
बदलेगा फिर बोलो कैसे गीतों,कविताओं से   / /
जो गिरवी रखकर कलम ,जोड़ते दौलत से यारी/
वे खाक करेंगे आम आदमी की पहरेदारी  / /
जब तक शब्दों के साथ कर्म का योग नहीं होता/
थोथे शब्दों का तब तक कुछ उपयोग नहीं होता//            .
व्यवहारपूत हर शब्द मंत्र जैसा फल देता है /
इसलिए हमारा शास्त्र आचरण पर बल देता है//
जब शब्दों के अनुरूप व्यक्ति के कार्य नहीं होते/
उनके उपदेश आम जन को स्वीकार्य नहीं होते//
हल और कुदाल,हथोड़ों से लिखते हैं जो साहित्य/
उनमें होता अभिव्यक्त हमारे जीवन का लालित्य//
थोथी चर्चा,सेमिनारों से कुछ न प्राप्त होगा /
भैरव श्रम से ही दैन्य भारती का समाप्त होगा//
बदलेगा तभी समाज आचरण का प्राधान्य हो जब/
"श्रम जीवन का आधार बने"यह मूल्य मान्य हो जब//